Sentence Errors Correction (वाक्य अशुद्धि शोधन)

वाक्य अशुद्धि शोधन = सार्थक एवं पूर्ण विचार व्यक्त करने वाले शब्द समूह को वाक्य कहा जाता है ! प्रत्येक भाषा का मूल ढांचा वाक्यों पर ही आधारित होता है ! इसलिए यह अनिवार्य है कि वाक्य रचना में पद -क्रम और अन्वय का विशेष ध्यान रखा जाए ! इनके प्रति सावधान न रहने से वाक्य रचना में कई प्रकार की भूलें हो जाती हैं ! 


वाक्य रचना के लिए अभ्यास की परम आवश्यकता होती है ! जैसे – 



1 – संज्ञा सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
  
      अशुद्ध                                                  शुद्ध 
 
– वह आंख से काना है ।                                वह काना है । 
– आप शनिवार के दिन चले जाएं ।                  आप शनिवार को चले जाएं । 
 
2 – परसर्ग सम्बन्धी अशुद्धियाँ
 
        अशुद्ध                                                   शुद्ध 
 
– आप भोजन किया ?                                 आपने भोजन किया । 
– उसने नहाया ।                                        वह नहाया । 
 
3 – लिंग सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
 
    अशुद्ध                                                    शुद्ध 
 
– हमारी नाक में दम है ।                           हमारे नाक में दम है । 
– मुझे आदेश दी ।                                   मुझे आदेश दिया । 
 
4 – वचन सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
 
       अशुद्ध                                              शुद्ध 
 
– उसे दो रोटी दे दो ।                                उसे दो रोटियां दे दो । 
– मेरा कान मत खाओ ।                           मेरे कान मत खाओ । 
 
5 – सर्वनाम सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
 
      अशुद्ध                                                      शुद्ध 
 
– तुम तुम्हारे रास्ते लगो ।                          तुम अपने रास्ते लगो । 
– हमको क्या ?                                       हमें क्या ? 
 
6 – विशेषण सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
 
      अशुद्ध                                              शुद्ध 
 
– मुझे छिलके वाला धान चाहिए ।               मुझे धान चाहिए । 
– एक गोपनीय रहस्य ।                            एक रहस्य । 
 
7 – क्रिया सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
 
       अशुद्ध                                          शुद्ध 
 
– उसे हरि को पटक डाला ।                    उसने हरि को पटक दिया । 
– वह चिल्ला उठा ।                             वह चिल्ला पड़ा । 
 
8 – मुहावरे सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
 
       अशुद्ध                                                शुद्ध 
 
– वह श्याम पर बरस गया ।                       वह श्याम पर बरस पड़ा । 
– उसकी अक्ल चक्कर खा गई ।                  उसकी अक्ल चकरा गई ।     
 
9 – क्रिया विशेषण सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
 
       अशुद्ध                                           शुद्ध  
 
– वह लगभग रोने लगा ।                       वह रोने लगा । 
– उसका सर नीचे था ।                           उसका सर नीचा था । 
 
10 – अव्यय सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
 
       अशुद्ध                                              शुद्ध 
 
–  वे संतान को लेकर दुखी थे ।                  वे संतान के कारण दुखी थे । 
– वहां अपार जनसमूह एकत्रित था ।            वहां अपार जन -समूह एकत्र था । 
 
11 –  वाक्यगत सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
 
          अशुद्ध                                            शुद्ध   
 
– तलवार की नोक पर –                         तलवार की धार पर – 
– मेरी आयु बीस की है ।                        मेरी अवस्था बीस वर्ष की है । 
 
12 – पुनरुक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ = 
 
           अशुद्ध                                             शुद्ध 
 
– मेरे पिता सज्जन पुरुष हैं ।                      मेरे पिता सज्जन हैं । 
– वे गुनगुने गर्म पानी से स्नान करते हैं ।      वे गुनगुने पानी से स्नान करते हैं । 

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Hindi Idioms (हिंदी मुहावरे)

Hindi Idioms: हिंदी मुहावरे :

  1. अंगूठा दिखाना – मना कर देना 
  2. अक्ल सठियाना – बुद्धि भ्रष्ट होना 
  3. अंगूठे पर रखना – परवाह न करना 
  4. अपना उल्लू सीधा करना – अपना काम बना लेना 
  5. अपनी खिचड़ी अलग पकाना – सबसे अलग रहना 
  6. आँखों का तारा – बहुत प्यारा 
  7. आँखें बिछाना – स्वागत करना 
  8. आँखों में धूल झोंकना – धोखा देना 
  9. आग बबूला होना – अत्यधिक क्रोध करना 
  10. आस्तिन का सांप होना – कपटी मित्र 
  11. आँखें दिखाना – धमकाना 
  12. आसमान टूट पड़ना – अचानक मुसीबत आ जाना 
  13. आसमान पर दिमाग होना – अहंकारी होना 
  14. ईंट का जवाब पत्थर से देना – करारा जवाब देना 
  15. ईद का चाँद होना – बहुत कम दिखाई देना 
  16. ईंट से ईंट बजाना – ध्वस्त कर देना 
  17. उल्टे छुरे से मूंढ़ना – ठग लेना 
  18. उड़ती चिड़िया के पंख गिनना – अत्यन्त चतुर होना  
  19. ऊंट के मुंह में जीरा होना – अधिक खुराक वाले को कम देना 
  20. एड़ी चोटी का जोर लगाना – बहुत प्रयास करना 
  21. ओखली में सिर देना – जान बूझकर मुसीबत मोल लेना 
  22. औधी खोपड़ी का होना – बेवकूफ होना 
  23. कलेजा ठण्डा होना – शांत होना 
  24. कलेजे पर पत्थर रखना – दिल मजबूत करना 
  25. कलेजे पर सांप लोटना – अन्तर्दाह होना 
  26. कलेजा मुंह को आना –  घबरा जाना 
  27. काठ का उल्लू होना – मूर्ख होना 
  28. कान काटना – चतुर होना 
  29. कान खड़े होना – सावधान हो जाना 
  30. काम तमाम करना – मार डालना 
  31. कुएं में बांस डालना – बहुत खोजबीन करना 
  32. कलई खुलना – पोल खुलना 
  33. कलेजा फटना – दुःख होना 
  34. कीचड़ उछालना – बदनाम करना 
  35. खून खौलना – क्रोध आना 
  36. खून का प्यासा होना – प्राण लेने को तत्पर होना 
  37. खाक छानना – भटकना 
  38. खटाई में पड़ना – व्यवधान आ जाना 
  39. गाल बजाना – डींग हांकना 
  40. गूलर का फूल होना – दुर्लभ होना 
  41. गांठ बांधना – याद रखना 
  42. गुड़ गोबर कर देना – काम बिगाड़ देना 
  43. घाट -घाट का पानी पीना – अनुभवी होना 
  44. घी के दिए जलाना – प्रसन्न होना 
  45. घुटने टेकना – हार मानना 
  46. घड़ों पानी पड़ना – लजिज्त होना 
  47. चाँद का टुकड़ा होना – बहुत सुंदर होना 
  48. चिकना घड़ा होना – बात का असर न होना 
  49. चांदी काटना – अधिक लाभ कमाना 
  50. चांदी का जूता मारना – रिश्वत देना 
  51. छक्के छुड़ाना – परास्त कर देना 
  52. छप्पर फाड़कर देना – अनायास लाभ होना 
  53. छटी का दूध याद आना – अत्यधिक कठिन होना 
  54. छाती पर मूंग दलना – पास रहकर दिल दु:खाना 
  55. छूमन्तर होना – गायब हो जाना 
  56. छाती पर सांप लोटना – ईर्ष्या करना 
  57. जबान को लगाम देना – सोच समझकर बोलना 
  58. जान के लाले पड़ना – प्राण संकट में पड़ना 
  59. जी खट्टा होना – मन फिर जाना 
  60. जमीन पर पैर न रखना – अहंकार होना 
  61. जहर उगलना – बुराई करना 
  62. जान पर खेलना – प्राणों की बाजी लगाना 
  63. टेढ़ी खीर होना – कठिन कार्य 
  64. टांग अड़ाना – दखल देना 
  65. टें बोल जाना – मर जाना 
  66. ठकुर सुहाती कहना – खुशामद करना 
  67. डकार जाना – हड़प लेना 
  68. ढोल की पोल होना – खोखला होना 
  69. तीन तेरह होना – बिखर जाना 
  70. तलवार के घाट उतारना – मार डालना 
  71. थाली का बैगन होना – सिद्धांतहीन होना 
  72. दांत काटी रोटी होना – गहरी दोस्ती 
  73. दो -दो हाथ करना – लड़ना 
  74. धूप में बाल सफेद होना – अनुभव होना 
  75. धाक जमाना – प्रभावित करना 
  76. नाकों चने चबाना – बहुत सताना 
  77. नाक -भौं सिकोड़ना – अप्रसन्नता व्यक्त करना 
  78. पत्थर की लकीर होना – अमिट होना 
  79. पेट में दाढ़ी होना – कम उम्र में अधिक जानना 
  80. पौ बारह होना – खूब लाभ होना 
  81. कालानाग होना – बहुत घातक व्यक्ति 
  82. केर -बेर का संग होना – विपरीत मेल 
  83. धोंधा वसंत होना – मूर्ख व्यक्ति 
  84. घूरे के दिन फिरना – अच्छे दिन आना 
  85. चंडूखाने की बातें करना – झूठी बातें होना 
  86. चंडाल चौकड़ी – दुष्टों का समूह 
  87. छिछा लेदर करना – दुर्दशा करना 
  88. टिप्पस लगाना – सिफारिश करना 
  89. टेक निभाना – प्रण पूरा करना 
  90. तारे गिनना – नींद न आना 
  91. त्रिशंकु होना – अधर में लटकना 
  92. मजा चखाना – बदला लेना 
  93. मन मसोसना – विवश होना 
  94. हाथ पसारना – मांगना 
  95. हाथ मलना – पछताना 
  96. हालत पतली होना – दयनीय दशा होना 
  97. सेमल का फूल होना – थोडें दिनों का असितत्व होना 
  98. सब्जबाग दिखाना – झूठी आशा देना 
  99. भुजा उठाकर कहना – प्रतिज्ञा करना 
  100. हाथ के तोते उड़ना – घबरा जाना

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Hindi Dialects (हिंदी की बोलियाँ)

Hindi Dialects  (हिंदी की बोलियाँ )

भाषा – भाषा वह साधन है , जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर , लिखकर या संकेतों द्वारा अपने मन के भावों एवं विचारों का आदान -प्रदान करता है !


भाषा के दो भेद हैं : –

 
1- मौखिक 
2- लिखित 
 
मौखिक रूप भाषा का अस्थायी रूप है लेकिन लिखित रूप स्थायी है !
 
लिपि – ध्वनियों को अंकित करने के लिए निश्चित किए गए प्रतीक चिन्हों की व्यवस्था को लिपि कहते है ! लिखित रूप भाषा को मानकता प्रदान करता है ! समाज को एक दूसरे से जोड़ने  में भाषा के लिखित रूप का महत्वपूर्ण योगदान है ! 
 
हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी लिपि है !
 
भाषा परिवार – भारत में दो भाषा परिवार अधिकांशत: प्रचलित है –
 
1- भारत यूरोपीय परिवार – उत्तर भारत में बोली जाने वाली भाषाएं ।
 
2- द्रविड़ भाषा परिवार – तमिल , तेलगू , मलयालम , कन्नड़ ।
 
बोली – भाषा के सीमित क्षेत्रीय रूप को बोली कहते हैं। एक भाषा के अंतर्गत कई बोलियाँ हो सकती हैं । जबकि एक बोली में कई भाषाएँ नहीं होती ! जिस रूप में आज हिंदी भाषा बोली व समझी जाती है वह खड़ी बोली का ही साहित्यिक भाषा रूप है ! 13 वीं -14 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अमीर खुसरो ने पहली बार खड़ी बोली में कविता रची ! ब्रजभाषा को सूरदास ने , अवधी को तुलसीदास ने और मैथिली को विधापति ने चरमोत्कर्ष पर  पहुँचाया !
 
हिंदी का क्षेत्र उत्तर भारत में हिमाचल प्रदेश ,हरियाणा , उत्तरांचल , उत्तरप्रदेश , बिहार ,झारखंड , छत्तीसगढ़ , मध्यप्रदेश ,राजस्थान , दिल्ली तथा दक्षिण में अंडमान निकोबार द्वीप समूह तक है ! इसके अलावा पंजाब ,महाराष्ट्र , गुजरात ,बंगाल आदि भागों में सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त होती है !
 
हिंदी की बोलियाँ =
 
1- पूर्वी हिंदी – इसका विकास अर्धमागधी अपभ्रंश से हुआ । इसके अंतर्गत अवधी , बघेली व छत्तीसगढ़ी बोलियाँ आती है । अवधी में तुलसीदास ने प्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस व जायसी ने पदमावत की रचना की ! 
 
2- पश्चिमी हिंदी = इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ । इसके अंतर्गत ब्रजभाषा , खड़ी बोली , हरियाणवी , बुंदेली और कन्नौजी आती है। ब्रजभाषा का क्षेत्र मथुरा , अलीगढ़ के पास है । सूरदास ने इसे चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया ।  खड़ी बोली दिल्ली , मेरठ , बिजनौर , मुजफ्फरनगर , रामपुर ,मुरादाबाद और सहारनपुर के आसपास बोली जाती थी ।  बुन्देली का क्षेत्र झाँसी , ग्वालियर व बुन्देलखण्ड के आसपास है । कन्नौजी क्षेत्र कन्नौज , कानपुर , पीलीभीत आदि । हिसार ,जींद ,रोहतक ,करनाल आदि जिलों में बांगरू भाषा बोली जाती है ! 
 
3- राजस्थानी हिंदी – इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ । इसके अंतर्गत मेवाड़ी ,मेवाती, मारवाड़ी और हाडौती बोलियाँ है । मेवाड़ी क्षेत्र मेवाड़ के आसपास है । मारवाड़ी का क्षेत्र जोधपुर , अजमेर , जैसलमेर ,बीकानेर  आदि है । मेवाती का क्षेत्र उत्तरी राजस्थान ,अलवर ,भरतपुर तथा हरियाणा में गुडगाँव के आसपास है । हाडौती राजस्थान के पूर्वी भाग व जयपुर के आसपास की बोली है !
 
4- बिहारी – इसके अंतर्गत भोजपुरी , मगही व मैथिली बोलियाँ है । भोजपुरी का क्षेत्र भोजपुर , बनारस ,जौनपुर ,मिर्जापुर ,बलिया ,गोरखपुर ,चम्पारन आदि तक है । मगही का क्षेत्र पटना, गया , हजारीबाग ,मुंगेर व भागलपुर के आसपास की बोली है । मैथिली का क्षेत्र मिथिला ,दरभंगा , मुजफ्फरपुर , पूर्णिया तथा मुंगेर में बोली जाती है । अब मैथिली को आठवीं अनुसूची में एक अलग भाषा के रूप में मान्यता दे दी गई है !
 
5- पहाड़ी – इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है । इसकी प्रमुख बोलियाँ गढवाली , कुमायूँनी , नेपाली हैं ! 

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Hindi Sentences (हिंदी वाक्य)

हिंदी वाक्य :- वक्ता के कथन को पूर्णत: व्यक्त करने वाले सार्थक शब्द समूह को वाक्य कहते हैं।

वाक्य में पूर्णता तभी आती है जब पद सुनिश्चित क्रम में हों और इन पदों में पारस्परिक अन्वय (समन्वय ) विद्यमान हो। वाक्य की शुद्धता भी पदक्रम एवं अन्वय से सम्बंधित है।
वाक्य के भेद:-
1. रचना की दृष्टि से:- रचना की दृष्टि से वाक्य तीन प्रकार के होते हैं:
    (अ) सरल वाक्य
    (ब) संयुक्त वाक्य
    (स) मिश्रित वाक्य
(अ) सरल वाक्य:- जिन वाक्यों में एक मुख्य क्रिया हो, उन्हें सरल वाक्य कहते हैं। जैसे पानी बरस रहा है।
(ब) संयुक्त वाक्य:- जिन वाक्यों में साधारण या मिश्र वाक्यों का मेल संयोजक अव्ययों द्वारा होते है उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं, जैसे राम घर गया और खाना खाकर सो गया।
(स) मिश्रित वाक्य:- इनमें एक प्रधान उपवाक्य होता है और एक आश्रित उपवाक्य होता है जैसे राम ने कहा कि मैं कल नहीं आ सकूंगा।
2. अर्थ की दृष्टि से वाक्य भेद:- ये आठ प्रकार के होते हैं: –
  (1) विधानार्थक :- जिसमें किसी बात के होने का बोध हो।  जैसे मोहन घर गया।
 
  (2 ) निषेधात्मक :- जिसमें किसी बात के न होने का बोध हो। जैसे सीता ने गीत नहीं गाया।
  (3)  आज्ञावाचक :- जिसमें आज्ञा दी गई हो। जैसे यहां बैठो।
  (4) प्रश्नवाचक :- जिसमें कोई प्रश्न किया गया हो। जैसे तुम कहाँ रहते हो?
  (5) विस्मयवाचक :- जिसमें किसी भाव का बोध हो। जैसे हाय, वह मर गया।
  (6) संदेहवाचक :- जिसमें संदेह या संभावना व्यक्त की गई हो। जैसे वह आ गया होगा।
  (7) इच्छावाचक :- जिसमें कोई इच्छा या कामना व्यक्त की जाए। जैसे ईश्वर तुम्हारा भला करे।
  (8) संकेतवाचक :- जहाँ एक वाक्य दूसरे वाक्य के होने पर निर्भर हो। जैसे यदि गर्मी पड़ती तो पानी बरसता।

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Hindi Words (शब्द)

शब्द :- भाषा की न्यूनतम इकाई वाक्य है और वाक्य की न्यूनतम इकाई शब्द है .

शब्द समूह :- प्रत्येक भाषा का अपना शब्द समूह होता है। इन शब्दों का प्रयोग भाषा के बोलने एवं लिखने में किया जाता है। 

सामान्यत: किसी भी भाषा के चार प्रकार के शब्द होते हैं:

1. तत्सम शब्द:- हिंदी में जो शब्द संस्कृत से ज्यों के त्यों ग्रहण कर लिए गए हैं तथा जिनमें कोई ध्वनि परिवर्तन नहीं हुआ है, तत्सम शब्द कहलाते हैं। जैसे राजा  ,बालक, लता आदि।
2. तद्भव  शब्द:- तद्भव का शाब्दिक अर्थ है तत + भव अर्थात उससे उत्पन्न। हिंदी में प्रयुक्त वह शब्दावली जो अनेक ध्वनि परिवर्तनों से गुज़रती हुई हिंदी में आई है, तद्भव शब्दावली है। जैसे आग, ऊँट, घोडा आदि।
उदाहरण: 
संस्कृत शब्द                                    तद्भव शब्द 
अग्नि                                                आग
उष्ट्र                                                     ऊँट
घोटक                                                घोड़ा
3. देशज शब्द:- ध्वन्यात्मक अनुकरण पर गढ़े  हुए वे शब्द जिनकी व्युत्पत्ति किसी तत्सम शब्द से नहीं होती, इस वर्ग में आते हैं। हिंदी में प्रयुक्त कुछ देशज शब्द भोंपू , तेंदुआ, थोथा आदि।
4. विदेशी शब्द:- दूसरी भाषाओं से आये हुए शब्द विदेशी शब्द कहे जाते हैं। हिंदी में विदेशी शब्द दो प्रकार के हैं:
– मुस्लिम शासन के प्रभाव से आये हुए
– अरबी फारसी शब्द
– ब्रिटिश शासन के प्रभाव से आये हुए अंग्रेजी शब्द
हिंदी भाषा में लगभग 2500 अरबी शब्द, 3500 फारसी शब्द और 3000 अंग्रेजी शब्द प्रयुक्त हो रहे हैं।
उदाहरण:
आदत, इनाम, नशा, अदा, अगर, पाजी, तोप, तमगा , सराय, अफसर, कलेक्टर, कोट,  मेयर, मादाम , पिकनिक , सूप आदि।

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Padbandh (Phrases) (पदबंध)

पदबंध – जब एक से अधिक पद मिलकर एक व्याकरणिक इकाई का काम करते हैं , तब उस बंधी हुई इकाई को पदबंध कहते हैं ! जैसे – सबसे तेज दौड़ने वाला घोड़ा जीत गया !


पदबंध के पाँच भेद होते हैं – 
1- संज्ञा पदबंध – जब एक से अधिक पद मिलकर संज्ञा का काम करें ,तो उस पदबंध को संज्ञा पदबंध कहते हैं ! संज्ञा पदबंध के शीर्ष में संज्ञा पद होता है , अन्य सभी पद उस पर आश्रित होते हैं ! जैसे – 
 
   दीवार के पीछे खड़ा पेड़ गिर गया ।
 
इस वाक्य में रेखांकित शब्द संज्ञा पदबंध हैं !
 
2- सर्वनाम पदबंध – जब एक से अधिक पद एक साथ जुड़कर सर्वनाम का कार्य करें तो उसे सर्वनाम पदबंध कहते  हैं ! इसके शीर्ष में सर्वनाम पद होता है ! जैसे –
 
    भाग्य की मारी तुम अब कहाँ जाओगी  ।
3- विशेषण पदबंध – जब एक से अधिक पद मिलकर किसी संज्ञा की विशेषता प्रकट करें , उन्हें विशेषण पदबंध  कहते हैं ! इसके शीर्ष में विशेषण होता है ! अन्य पद उस विशेषण पर आश्रित होते हैं ! इसमें प्रमुखतया प्रविशेषण लगता है ! जैसे – 
 
    मुझे चार किलो पिसी हुई लाल मिर्च ला दो ।
 
4- क्रिया पदबंध – जब एक से अधिक क्रिया पद मिलकर एक इकाई के रूप में क्रिया का कार्य संपन्न करते हैं , वे क्रिया पदबंध कहलाते हैं ! इस पदबंध के शीर्ष में क्रिया होती है ! 
    जैसे – 
             वह पढ़कर सो गया है
 
 
5- क्रियाविशेषण पदबंध – जो पदबंध क्रियाविशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं , उन्हें क्रियाविशेषण पदबंध कहते हैं ! इसमें क्रियाविशेषण शीर्ष पर होता है और प्राय: प्रविशेषण आश्रित पद होते हैं ! जैसे – 
 
    मैं बहुत तेजी से दौड़कर गया ।

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Kaal (Tenses) (काल)

काल – क्रिया के करने या होने के समय को काल कहते हैं काल के तीन भेद हैं –

1- भूतकाल – ‘ भूत का अर्थ है – बीता हुआ । क्रिया के जिस रूप से यह पता चले कि क्रिया का व्यापार पहले समाप्त हो चुका है , वह भूतकाल कहलाता है ; जैसे – 
    सीता ने खाना पकाया । इस वाक्य से क्रिया के समाप्त होने बोध होता है ।   अत: यहां भूतकाल क्रिया का प्रयोग हुआ है !
 
2- वर्तमान काल – वर्तमान का अर्थ है – उपस्थित अर्थात जिस क्रिया से इस बात की सूचना मिले कि क्रिया का व्यापार अभी भी चल रहा है , समाप्त नहीं हुआ , उसे वर्तमान काल कहते हैं ; जैसे – मोहन गाता है
 
3- भविष्यत काल – भविष्यत का अर्थ है – आने वाला समय । अत: क्रिया के जिस रूप से भविष्यत में क्रिया होने का बोध हो , उसे भविष्यत काल की क्रिया कहते हैं;
    जैसे – सीता कल दिल्ली जाएगी ।  ( गा , गे , गी  भविष्यत काल के परिचायक चिन्ह हैं !)

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Alankaar (Figure of Speech) (अलंकार)

अलंकार –  ” काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व अलंकार कहे जाते हैं ! “


अलंकार के तीन भेद हैं – 

 
1. शब्दालंकार –  ये शब्द पर आधारित होते हैं ! प्रमुख शब्दालंकार हैं –  अनुप्रास , यमक , शलेष , पुनरुक्ति , वक्रोक्ति  आदि !
 
2. अर्थालंकार –  ये अर्थ पर आधारित होते हैं !  प्रमुख अर्थालंकार हैं –  उपमा , रूपक , उत्प्रेक्षा, प्रतीप , व्यतिरेक , विभावना , विशेषोक्ति ,अर्थान्तरन्यास , उल्लेख , दृष्टान्त, विरोधाभास , भ्रांतिमान  आदि !
 
3.उभयालंकार– उभयालंकार शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित रहकर दोनों को चमत्कृत करते हैं!
1- उपमा – जहाँ गुण , धर्म या क्रिया के आधार पर उपमेय की तुलना उपमान से की जाती है   
     जैसे – 
              हरिपद कोमल कमल से  ।
 
हरिपद ( उपमेय )की तुलना कमल ( उपमान ) से कोमलता के कारण की गई ! अत: उपमा अलंकार है !
 
2-  रूपक – जहाँ उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप किया जाता है ! जैसे –
 
                   अम्बर पनघट में डुबो रही ताराघट उषा नागरी  ।
 
आकाश रूपी पनघट में उषा रूपी स्त्री तारा रूपी घड़े डुबो रही है ! यहाँ आकाश पर पनघट का , उषा पर स्त्री का और तारा पर घड़े का आरोप होने से रूपक अलंकार है !
 
3- उत्प्रेक्षा – उपमेय में उपमान की कल्पना या सम्भावना होने पर उत्प्रेक्षा अलंकार होता है ! 
     जैसे – 
                मुख मानो चन्द्रमा है
 
यहाँ मुख ( उपमेय ) को चन्द्रमा ( उपमान ) मान लिया गया है ! यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है !
इस अलंकार की पहचान मनु , मानो , जनु , जानो शब्दों से होती है !
 
4- यमक – जहाँ कोई शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त हो और उसके अर्थ अलग -अलग हों वहाँ यमक अलंकार होता है ! जैसे –
 
                      सजना है मुझे सजना के लिए  ।
 
यहाँ पहले सजना का अर्थ है – श्रृंगार करना और दूसरे सजना का अर्थ – नायक शब्द दो बार प्रयुक्त है ,अर्थ अलग -अलग हैं ! अत: यमक अलंकार है !
 
5- शलेष – जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो , किन्तु प्रसंग भेद में उसके अर्थ एक से अधिक हों , वहां शलेष अलंकार है ! जैसे –
 
              रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून  ।
              पानी गए न ऊबरै मोती मानस चून  ।।
 
यहाँ पानी के तीन अर्थ हैं – कान्ति , आत्म – सम्मान  और जल  ! अत: शलेष अलंकार है , क्योंकि पानी शब्द एक ही बार प्रयुक्त है तथा उसके अर्थ तीन हैं !
 
6- विभावना – जहां कारण के अभाव में भी कार्य हो रहा हो , वहां विभावना अलंकार है !जैसे –
 
                        बिनु पग चलै सुनै बिनु काना
 
वह ( भगवान ) बिना पैरों  के चलता है और बिना कानों के सुनता है ! कारण के अभाव में कार्य होने से यहां विभावना अलंकार है !
 
7- अनुप्रास –  जहां किसी  वर्ण की अनेक बार क्रम से आवृत्ति  हो वहां अनुप्रास अलंकार होता है ! जैसे – 
 
                    भूरी -भूरी भेदभाव भूमि से भगा दिया  । 
 
‘ भ ‘ की आवृत्ति  अनेक बार होने से यहां अनुप्रास अलंकार है !
 
8- भ्रान्तिमान – उपमेय में उपमान की भ्रान्ति होने से और तदनुरूप क्रिया होने से भ्रान्तिमान अलंकार होता है ! जैसे –
 
नाक का मोती अधर की कान्ति से , बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से,  
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है,  सोचता है अन्य शुक यह कौन है ?
 
यहां नाक में तोते का और दन्त  पंक्ति में अनार के दाने का भ्रम हुआ है , यहां भ्रान्तिमान अलंकार है !
 
9- सन्देह – जहां उपमेय के लिए  दिए गए उपमानों में सन्देह बना रहे तथा निशचय न हो सके, वहां सन्देह अलंकार होता है !जैसे –
 
          सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है ।
          सारी ही की नारी है कि नारी की ही सारी है
 
10- व्यतिरेक – जहां कारण बताते हुए उपमेय की श्रेष्ठता उपमान से बताई गई हो , वहां व्यतिरेक अलंकार होता है !जैसे –
 
          का सरवरि तेहिं देउं मयंकू । चांद कलंकी वह निकलंकू ।।
 
मुख की समानता चन्द्रमा से कैसे दूं ? चन्द्रमा में तो कलंक है , जबकि मुख निष्कलंक है !
 
11- असंगति – कारण और कार्य में संगति न होने पर असंगति अलंकार होता है ! जैसे –
 
                      हृदय घाव मेरे पीर रघुवीरै
 
घाव तो लक्ष्मण के हृदय में हैं , पर पीड़ा राम को है , अत: असंगति अलंकार है !
 
12- प्रतीप – प्रतीप का अर्थ है उल्टा या विपरीत । यह उपमा अलंकार के विपरीत होता है । क्योंकि इस अलंकार में उपमान को लज्जित , पराजित या हीन दिखाकर उपमेय की श्रेष्टता बताई जाती है ! जैसे – 
 
               सिय मुख समता किमि करै चन्द वापुरो रंक
 
सीताजी के मुख ( उपमेय )की तुलना बेचारा चन्द्रमा ( उपमान )नहीं कर सकता । उपमेय की श्रेष्टता प्रतिपादित होने से यहां प्रतीप अलंकार है !
 
13- दृष्टान्त – जहां उपमेय , उपमान और साधारण धर्म का बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव होता है,जैसे-
             बसै बुराई जासु तन ,ताही को सन्मान ।
             भलो भलो कहि छोड़िए ,खोटे ग्रह जप दान ।।
 
यहां पूर्वार्द्ध में उपमेय वाक्य और उत्तरार्द्ध में उपमान वाक्य है ।इनमें ‘ सन्मान होना ‘ और ‘ जपदान करना ‘ ये दो भिन्न -भिन्न धर्म कहे गए हैं । इन दोनों में बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव है । अत: दृष्टान्त अलंकार है ! 
 
14- अर्थान्तरन्यास – जहां सामान्य कथन का विशेष से या विशेष कथन का सामान्य से समर्थन किया जाए , वहां अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है ! जैसे –
 
              जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग ।
              चन्दन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग ।।
 
15- विरोधाभास – जहां वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास मालूम पड़े , वहां विरोधाभास अलंकार होता है ! जैसे –
 
              या अनुरागी चित्त की गति समझें नहीं कोइ ।
              ज्यों -ज्यों बूडै स्याम रंग त्यों -त्यों उज्ज्वल होइ ।।
 
यहां स्याम रंग में डूबने पर भी उज्ज्वल होने में विरोध आभासित होता है , परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । अत: विरोधाभास अलंकार है ! 
 
16- मानवीकरण – जहां जड़ वस्तुओं या प्रकृति पर मानवीय चेष्टाओं का आरोप किया जाता है , वहां मानवीकरण अलंकार है ! जैसे –
 
              फूल हंसे कलियां मुसकाई
 
यहां फूलों का हंसना , कलियों का मुस्कराना मानवीय चेष्टाएं हैं , अत: मानवीकरण अलंकार है!
 
17- अतिशयोक्ति – अतिशयोक्ति का अर्थ है – किसी बात को बढ़ा -चढ़ाकर कहना । जब काव्य में कोई बात बहुत बढ़ा -चढ़ाकर कही जाती है तो वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है !जैसे –
 
                           लहरें व्योम चूमती उठतीं
 
यहां लहरों को आकाश चूमता हुआ दिखाकर अतिशयोक्ति का विधान किया गया है !
 
18- वक्रोक्ति – जहां किसी वाक्य में वक्ता के आशय से भिन्न अर्थ की कल्पना की जाती है , वहां वक्रोक्ति अलंकार होता है !    
    – इसके दो भेद होते हैं – (1 ) काकु वक्रोक्ति   (2) शलेष वक्रोक्ति  ।   
 
1- काकु वक्रोक्ति – वहां होता है जहां वक्ता के कथन का कण्ठ ध्वनि के कारण श्रोता भिन्न अर्थ लगाता है । जैसे –
 
              मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू
 
2- शलेष वक्रोक्ति – जहां शलेष के द्वारा वक्ता के कथन का भिन्न अर्थ लिया जाता है ! जैसे –
 
              को तुम हौ इत आये कहां घनस्याम हौ तौ कितहूं बरसो ।
              चितचोर कहावत हैं हम तौ तहां जाहुं जहां धन है सरसों ।।
 
19- अन्योक्ति – अन्योक्ति का अर्थ है अन्य के प्रति कही गई उक्ति । इस अलंकार में अप्रस्तुत के  माध्यम से प्रस्तुत का वर्णन किया जाता है ! जैसे –
 
             नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल ।
             अली कली ही सौं बिध्यौं आगे कौन हवाल  ।।
 
यहां भ्रमर और कली का प्रसंग अप्रस्तुत विधान के रूप में है जिसके माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत किया गया है , अत: अन्योक्ति अलंकार है !                                                                                  
 
    
 

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Vaachya (Voice) (वाच्य)

वाच्य :- क्रिया के जिस रूपांतर से यह बोध हो कि क्रिया द्वारा किए गए विधान का केंद्र बिंदु कर्ता है , कर्म अथवा क्रिया -भाव , उसे वाच्य कहते हैं !

वाच्य के तीन भेद हैं – 

 
1- कर्तृवाच्य –  जिसमें कर्ता प्रधान हो उसे कर्तृवाच्य कहते हैं !
 
    कर्तृवाच्य में क्रिया के लिंग , वचन आदि कर्ता के समान होते हैं , जैसे – सीता गाना गाती है , इस वाच्य में सकर्मक और अकर्मक दोनों प्रकार की क्रियाओं का प्रयोग किया जाता है !
     कभी -कभी कर्ता के साथ  ‘ ने ‘  चिन्ह नहीं लगाया जाता !
 
2-  कर्मवाच्य –  जिस वाक्य में कर्म प्रधान होता है , उसे कर्मवाच्य कहते हैं !
    कर्मवाच्य में क्रिया के लिंग , वचन आदि कर्म के अनुसार होते हैं , जैसे – रमेश से पुस्तक लिखी जाती है ! इसमें केवल  ‘ सकर्मक ‘ क्रियाओं का प्रयोग होता है !
 
3-  भाववाच्य –  जिस वाक्य में भाव प्रधान होता है , उसे भाववाच्य कहते हैं !
     भाववाच्य में क्रिया की प्रधानता रहती है , इसमें क्रिया सदा एक वचन , पुल्लिंग और अन्य पुरुष में आती है ! इसका प्रयोग प्राय: निषेधार्थ में होता है , 
     जैसे – चला नहीं जाता , पीया नहीं जाता !
 
–  कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य बनाना :-
 
 
          ( कर्तृवाच्य )                             ( कर्मवाच्य )
 
1-   रीमा चित्र बनाती है !               –  रीमा द्वारा चित्र बनाया जाता है !
 
2-   मैंने पत्र लिखा !                     –  मुझसे पत्र लिखा गया !
–  कर्तृवाच्य से भाववाच्य बनाना :-
 
          ( कर्तृवाच्य )                             ( भाववाच्य )
 
1-   मैं नहीं पढ़ता !                      –   मुझसे पढ़ा नहीं जाता !
 
2-   राम नहीं रोता है !                  –   राम से रोया नहीं जाता !

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