ड़ और ढ़ (उत्क्षिप्त व्यंजन) का प्रयोग कहाँ वर्जित है? जानिए शुद्ध हिंदी लिखने के अचूक नियम

हिंदी भाषा की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसे जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है। लेकिन इसी खूबसूरती के पीछे छिपे हैं व्याकरण के कुछ ऐसे सूक्ष्म नियम, जिन्हें नजरअंदाज करने पर बड़े से बड़े विद्वान और छात्र अक्सर लिखने में गलतियाँ कर बैठते हैं।

हिंदी वर्तनी (Spelling) में सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करने वाले दो वर्ण हैं — ‘ड़’ और ‘ढ़’

आपने कई बार देखा होगा कि कुछ लोग ‘डमरू’ को ‘ड़मरू’ लिख देते हैं, या ‘ढोलक’ को ‘ढ़ोलक’। वहीं कुछ लोग ‘रोड’ को ‘रोड़’ या ‘पंडित’ को ‘पंड़ित’ लिख बैठते हैं। क्या आप जानते हैं कि ये सभी शब्द वर्तनी की दृष्टि से पूरी तरह अशुद्ध हैं?

‘ड़’ और ‘ढ़’ को हिंदी व्याकरण में ‘उत्क्षिप्त व्यंजन’ (Tadanjat Consonants) या ‘द्विगुण व्यंजन’ कहा जाता है। इनका सही प्रयोग कहाँ होना चाहिए, इससे ज्यादा जरूरी यह जानना है कि इनका प्रयोग कहाँ पूरी तरह वर्जित (Forbidden) है।

यदि आप स्कूल या कॉलेज के छात्र हैं, UPSC, State PSC, CTET, UPTET, KVS, REET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, या हिंदी में कंटेंट राइटिंग करते हैं—तो यह लेख आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। आइए, बिना किसी उलझन के बिल्कुल आसान और व्यावहारिक भाषा में समझते हैं कि ‘ड़’ और ‘ढ़’ का प्रयोग कहाँ नहीं करना चाहिए।

1. ‘उत्क्षिप्त व्यंजन’ क्या होते हैं? (सरल भाषा में समझें)

नियमों को जानने से पहले यह समझना जरूरी है कि ‘ड़’ और ‘ढ़’ आखिर आए कहाँ से?

मूल संस्कृत या वैदिक भाषा में ‘ड़’ और ‘ढ़’ वर्ण नहीं थे। संस्कृत में केवल ‘ड’ और ‘ढ’ (ट-वर्ग के तीसरे और चौथे वर्ण) होते थे। जब अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ, तब उच्चारण को अधिक सहज और प्रवाहमयी बनाने के लिए ‘ड’ के नीचे बिंदी (नुक्ता) लगाकर ‘ड़’ और ‘ढ’ के नीचे बिंदी लगाकर ‘ढ़’ बनाया गया।

उत्क्षिप्त का अर्थ:

‘उत्क्षिप्त’ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है — “ऊपर फेंका हुआ”। जब हम ‘ड़’ या ‘ढ़’ का उच्चारण करते हैं, तो हमारी जीभ की नोक पहले ऊपर तालु को छूती है और फिर झटके से नीचे गिरती है। इसीलिए इन्हें ‘उत्क्षिप्त’ या ‘ताड़नजात’ व्यंजन कहा जाता है।

‘ड-ढ’ और ‘ड़-ढ़’ में अंतर:

  • ड और ढ: ये मूल व्यंजन हैं जो ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण) में आते हैं।
  • ड़ और ढ़: ये विकसित व्यंजन (द्विगुण) हैं जो ड और ढ के नीचे बिंदी लगाकर बनते हैं।

2. ‘ड़’ और ‘ढ़’ का प्रयोग कहाँ वर्जित (मना) है?

हिंदी व्याकरण के अनुसार मुख्य रूप से 5 ऐसी स्थितियाँ हैं जहाँ शब्द में ‘ड़’ और ‘ढ़’ (बिंदी वाले वर्णों) का प्रयोग भूलकर भी नहीं करना चाहिए। इन जगहों पर हमेशा मूल वर्ण ‘ड’ और ‘ढ’ का ही प्रयोग होता है।

आइए, एक-एक करके इन सभी नियमों को विस्तार से और उदाहरणों के साथ समझते हैं:

नियम 1: शब्द के आरंभ (शुरुआत) में प्रयोग पूरी तरह वर्जित है

हिंदी भाषा का यह सबसे पहला और सबसे ठोस नियम है:

किसी भी शब्द की शुरुआत कभी भी ‘ड़’ या ‘ढ़’ से नहीं हो सकती।

यदि कोई शब्द ‘ड’ या ‘ढ’ की ध्वनि से शुरू हो रहा है, तो उस पर कभी भी नीचे बिंदी (नुक्ता) नहीं लगेगी। शब्द के प्रारंभ में हमेशा ‘ड’ और ‘ढ’ ही लिखे जाते हैं।

उदाहरण से समझें:

अशुद्ध रूप (गलत)शुद्ध रूप (सही)अशुद्ध रूप (गलत)शुद्ध रूप (सही)
ड़मरूडमरूढ़ोलकढोलक
ड़ाकघरडाकघरढ़ाकाढाका
ड़रडरढ़क्कनढक्कन
ड़ालनाडालनाढ़ीलाढीला
ड़ाइनोसॉरडाइनोसॉरढ़ोंगढोंग

विशेष नोट: यदि आप किसी पुस्तक या बोर्ड पर शब्द के शुरू में बिंदी देखते हैं, तो समझ जाएँ कि वह प्रिंटिंग या वर्तनी की भारी भूल है।

नियम 2: तत्सम (संस्कृत) शब्दों में प्रयोग वर्जित है

संस्कृत भाषा से हिंदी में ज्यों-के-त्यों आए शब्दों को ‘तत्सम शब्द’ कहा जाता है। जैसा कि हमने ऊपर जाना, मूल संस्कृत व्याकरण में ‘ड़’ और ‘ढ़’ का अस्तित्व ही नहीं था। इसलिए, किसी भी संस्कृत या तत्सम शब्द में ‘ड़’ या ‘ढ़’ का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है।

यदि किसी संस्कृत शब्द के बीच में या अंत में ‘ड’ या ‘ढ’ आता है, तो वह बिना बिंदी के ही लिखा जाएगा।

उदाहरण से समझें:

अशुद्ध रूप (गलत)शुद्ध रूप (सही)शब्द का प्रकार
मंड़लमंडलतत्सम (संस्कृत)
गरुड़ (संस्कृत संदर्भ में)गरुड / गरुड़ (तद्भव में)मूल तत्सम: गरुड
पीड़ा (संस्कृत मूल)पीडामूल रूप
गूढ़ (संस्कृत)गूढतत्सम में ‘ढ’ ही रहता है
निषाढ़आषाढ़ / आषाढतत्सम रूप

नियम 3: अनुस्वार (ं) या पंचमाक्षर के बाद प्रयोग वर्जित है

यदि किसी शब्द में ‘ड’ या ‘ढ’ से ठीक पहले अनुस्वार (अंक की बिंदी ‘ं’) या ट-वर्ग का पंचमाक्षर ‘ण’ (स्वर-रहित आधा ‘ण्’) आ जाए, तो उसके बाद कभी भी बिंदी वाले ‘ड़’ या ‘ढ़’ का प्रयोग नहीं होता।

वहाँ केवल मूल ‘ड’ या ‘ढ’ का ही प्रयोग किया जाएगा।

उदाहरण से समझें:

अशुद्ध रूप (गलत)शुद्ध रूप (सही)कारण
पंड़ितपंडितअनुस्वार के बाद ‘ड’ आएगा
अंड़ाअंडाअनुस्वार का प्रयोग हुआ है
डंड़ाडंडाअनुस्वार के कारण बिना बिंदी
खंडार (खंड़ार)खंडहर / खंड‘ण्’ या अनुस्वार के बाद ‘ड’
मंड़पमंडपअनुस्वार के बाद ‘ड’

नियम 4: द्वित्व (आधे और पूरे) व्यंजनों के साथ प्रयोग वर्जित है

हिंदी व्याकरण में जब दो समान व्यंजन एक साथ जुड़कर आते हैं, तो उसे द्वित्व व्यंजन (Double Consonants) कहा जाता है (जैसे: बच्चा, सच्चा, पत्ता)।

‘ड’ और ‘ढ’ के मामले में नियम यह है कि उत्क्षिप्त व्यंजनों (‘ड़’ और ‘ढ़’) का कभी भी द्वित्व रूप नहीं बनता।

यानी, आप कभी भी आधा ‘ड़्’ और पूरा ‘ड़’ एक साथ नहीं लिख सकते। जब भी ये दो बार एक साथ आएंगे, तो हमेशा बिना बिंदी वाले ‘ड्ड’ या ‘ढ्ढ’ के रूप में ही लिखे जाएंगे।

उदाहरण से समझें:

अशुद्ध रूप (गलत)शुद्ध रूप (सही)
गुड़्डागुड्डा
गड़्ढागड्ढा
कड़्डीकड्डी / कबड्डी
बुड़्ढाबुड्ढा
हड़्डीहड्डी

नियम 5: अंग्रेजी और अन्य विदेशी (आगत) शब्दों में प्रयोग वर्जित है

आज की हिंदी में अंग्रेजी, उर्दू, अरबी और फारसी के अनेक शब्दों का प्रयोग बहुतायत से होता है।

अंग्रेजी भाषा के जितने भी शब्दों में Letter ‘D’ आता है और उसका उच्चारण ‘ड’ होता है, हिंदी में उसे लिखते समय कभी भी ‘ड़’ (बिंदी वाले) का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अंग्रेजी के शब्दों में केवल मूल ‘ड’ का ही प्रयोग होता है।

इसी तरह अरबी-फारसी के आगत शब्दों में भी ‘ड’ और ‘ढ’ का ही रूप सुरक्षित रहता है।

उदाहरण से समझें:

अशुद्ध रूप (गलत)शुद्ध रूप (सही)अंग्रेजी शब्द
रोड़रोडRoad
बोड़बोर्डBoard
रेड़ियोरेडियोRadio
मोड़लमॉडलModel
राउंड़राउंडRound
लीड़रलीडरLeader

3. एक नज़र में: ‘ड़’ और ‘ढ़’ के वर्जित नियमों का मास्टर चार्ट

आपकी सुविधा और त्वरित रिवीजन (Quick Revision) के लिए नीचे एक स्पष्ट चार्ट दिया जा रहा है:

                      'ड़' और 'ढ़' का प्रयोग कहाँ वर्जित है?
                                       │
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1. शब्द के आरंभ में  2. तत्सम शब्दों में      3. अनुस्वार के बाद     4. अंग्रेजी शब्दों में
   (उदा: ढोलक)        (उदा: मंडल)               (उदा: पंडित)          (उदा: रोड)
स्थितिक्या प्रयोग करें? (सही)क्या प्रयोग न करें? (गलत)उदाहरण
शब्द की शुरुआत मेंड, ढड़, ढ़डाकघर (न कि ड़ाकघर)
संस्कृत (तत्सम) शब्दों मेंड, ढड़, ढ़तांडव (न कि तांड़व)
अनुस्वार (ं / ण्) के बादड, ढड़, ढ़डंडा (न कि डंड़ा)
द्वित्व (दोहराव) होने परड्ड, ढ्ढड़्ड़, ढ़्ढ़गड्ढा (न कि गड़्ढा)
अंग्रेजी/विदेशी शब्दों मेंड, ढड़, ढ़बोर्ड (न कि बोड़)

4. फिर ‘ड़’ और ‘ढ़’ का प्रयोग कहाँ होता है?

अब स्वाभाविक रूप से आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि जब इतनी जगहों पर ‘ड़’ और ‘ढ़’ वर्जित हैं, तो आखिर इनका प्रयोग होता कहाँ है?

नियम बहुत सरल है:

जब तद्भव (हिंदी के अपने) या देशज शब्दों के बीच में (Middle) या अंत में (End) ‘ड’ या ‘ढ’ की ध्वनि आती है, और उससे पहले कोई अनुस्वार या पंचमाक्षर नहीं होता, तब हमेशा ‘ड़’ और ‘ढ़’ का प्रयोग किया जाता है।

सही प्रयोग के उदाहरण:

  • शब्द के बीच में:
    • ड़क, लड़का, पकड़ना, कढ़ाई, पढ़ना, उड़ान।
  • शब्द के अंत में:
    • पेड़, पेड़-पौधे, चढ़ाई का चढ़, बाढ़, गढ़, कोढ़

5. छात्रों और परीक्षार्थियों के लिए अभ्यास प्रश्न (Self-Test)

नीचे दिए गए वाक्यों को ध्यान से पढ़ें और पहचानें कि किस शब्द में वर्तनी की गलती है:

  1. रमेश रोज सुबह रोड़ पर दौड़ने जाता है। (गलती: रोड़ ➔ सही: रोड)
  2. रामचरितमानस में चौपाई का पाठ पंड़ित जी कर रहे हैं। (गलती: पंड़ित ➔ सही: पंडित)
  3. बच्चे ड़मरू की आवाज सुनकर खुश हो गए। (गलती: ड़मरू ➔ सही: डमरू)
  4. बारिश के कारण रास्ते में बड़ा गड़्ढा हो गया है। (गलती: गड़्ढा ➔ सही: गड्ढा)
  5. हमें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। (यह वाक्य पूरी तरह शुद्ध है, क्योंकि ‘पढ़ाई’ में बीच में ‘ढ़’ आया है।)

निष्कर्ष (Conclusion)

हिंदी भाषा की वर्तनी कोई कठिन पहेली नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से वैज्ञानिक नियमों पर आधारित है। ‘ड़’ और ‘ढ़’ (उत्क्षिप्त व्यंजन) के प्रयोग के नियमों को यदि संक्षेप में याद रखना हो, तो बस 3 बातें याद रखिए:

  1. शुरुआत में कभी नहीं (हमेशा ‘ड’ और ‘ढ’)।
  2. संस्कृत, अंग्रेजी और अनुस्वार के साथ कभी नहीं (हमेशा ‘ड’ और ‘ढ’)।
  3. हिंदी के तद्भव शब्दों के बीच या अंत में हमेशा (‘ड़’ और ‘ढ़’)।

इन छोटे-छोटे नियमों का ध्यान रखकर आप न केवल अपनी हिंदी की लिखावट को त्रुटिहीन (Error-free) बना सकते हैं, बल्कि परीक्षाओं में भी पूरे अंक हासिल कर सकते हैं।

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो, तो इसे अपने दोस्तों, बच्चों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे साथियों के साथ जरूर शेयर करें। व्याकरण से जुड़ा कोई भी सवाल हो, तो नीचे कमेंट बॉक्स में पूछना न भूलें!

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