हिंदी व्याकरण केवल नियमों की किताब नहीं है, बल्कि यह मानव शरीर की श्वास प्रक्रिया और ध्वनि-विज्ञान (Phonetics) पर आधारित एक बेहद सटीक और वैज्ञानिक ढांचा है। जब हम कोई भी वर्ण बोलते हैं, तो हमारे फेफड़ों से उठी हवा गले, जिह्वा (जीभ), तालु, होंठ और स्वरतंत्री से होकर बाहर निकलती है। इस पूरी प्रक्रिया में जो प्रयास या कोशिश करनी पड़ती है, उसी को हिंदी व्याकरण में ‘प्रयत्न’ कहा जाता है।
यदि आप किसी प्रतियोगी परीक्षा (जैसे UPSC, State PCS, CTET, UPTET, REET, DSSSB या TGT/PGT) की तैयारी कर रहे हैं, तो ‘प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण’ एक ऐसा अध्याय है जहाँ से हर साल प्रश्न पूछे जाते हैं।
इस विस्तृत लेख में हम प्रयत्न के अर्थ, इसके दो मुख्य प्रकारों—आभ्यंतर प्रयत्न और बाह्य प्रयत्न—तथा इनके अंतर्गत आने वाले सभी भेदों को बहुत ही सरल, व्यावहारिक और प्रामाणिक रूप से समझेंगे।
प्रयत्न क्या है? (Meaning of Prayatna)
ध्वनि या वर्ण का उच्चारण करते समय हमारे मुख-विवर (मुँह के अंदर) और स्वर-यंत्र द्वारा किए जाने वाले शारीरिक प्रयास को प्रयत्न कहते हैं।
इसे एक सरल उदाहरण से समझें: जब आप ‘क’ बोलते हैं, तो आपकी जीभ कंठ को छूती है; लेकिन जब आप ‘स’ बोलते हैं, तो जीभ हवा को एक पतली गली से रगड़ते हुए बाहर जाने देती है। उच्चारण की इसी भिन्नता और कोशिश को व्याकरण में प्रयत्न की संज्ञा दी गई है।
प्रयत्न को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है:
[ प्रयत्न (Effort) ]
│
┌────────────────────────┴────────────────────────┐
▼ ▼
[ आभ्यंतर प्रयत्न ] [ बाह्य प्रयत्न ]
(मुँह के अंदर का प्रयास) (मुँह से बाहर निकलते समय)
- आभ्यंतर प्रयत्न (Internal Effort): ध्वनि उत्पन्न होने से ठीक पहले मुख के भीतर (जीभ, तालु, ओष्ठ आदि द्वारा) किया जाने वाला अंदरूनी प्रयास।
- बाह्य प्रयत्न (External Effort): ध्वनि के मुख से बाहर निकलते समय श्वास की मात्रा या स्वरतंत्री में होने वाला कंपन।
1. आभ्यंतर प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों के भेद
आभ्यंतर शब्द ‘आंतरिक’ से बना है। वर्ण के उच्चारण की शुरुआत में मुख-विवर के भीतर जिह्वा और अन्य उच्चारण अंगों द्वारा जो स्थिति बनती है, उसे आभ्यंतर प्रयत्न कहते हैं।
आभ्यंतर प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों को मुख्य रूप से 8 श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
(i) स्पर्षी व्यंजन (Stops / Plosives)
जिन व्यंजनों के उच्चारण में फेफड़ों से आने वाली वायु मुख के किसी विशेष स्थान (कंठ, तालु, मूर्धा, दंत, ओष्ठ) को पूरी तरह स्पर्श करती है और फिर अचानक बाहर निकलती है।
- वर्ण: क, ख, ग, घ | ट, ठ, ड, ढ | त, थ, द, ध | प, फ, ब, भ (कुल 16 वर्ण)
- ध्यान दें: पारंपरिक रूप से 25 स्पर्शी व्यंजन माने जाते हैं, लेकिन वैज्ञानिक आभ्यंतर प्रयत्न के तहत च-वर्ग को अलग श्रेणी में रखा जाता है।
(ii) स्पर्श-संघर्षी व्यंजन (Affricates)
इन व्यंजनों के उच्चारण में जीभ उच्चारण स्थान को स्पर्श तो करती है, लेकिन वायु तुरंत बाहर न निकलकर थोड़ा घर्षण (friction) करते हुए बाहर आती है।
- वर्ण: च, छ, ज, झ (4 वर्ण)
(iii) संघर्षी व्यंजन (Fricatives)
जिन व्यंजनों के उच्चारण में दो उच्चारण अंग इतने पास आ जाते हैं कि बीच का मार्ग बहुत सँकरा हो जाता है। हवा उस सँकरे रास्ते से रगड़ (घर्षण) खाते हुए सीटी या ऊष्मा की तरह बाहर निकलती है।
- वर्ण: श, ष, स, ह और आगत ध्वनियाँ (फ़, ज़, ख़, ग़)
(iv) नासिक्य व्यंजन (Nasals)
जिन वर्णों के उच्चारण में मुख के साथ-साथ हवा नाक (नासिक) से भी बाहर निकलती है। प्रत्येक वर्ग का पंचम अक्षर नासिक्य होता है।
- वर्ण: ङ, ञ, ण, न, म (5 वर्ण)
(v) पार्श्विक व्यंजन (Lateral)
‘पार्श्व’ का अर्थ होता है ‘बगल या किनारा’। जिस वर्ण के उच्चारण में जीभ की नोक ऊपर मसूड़े (वर्त्स्य) को छूती है और हवा जीभ के दोनों बगलों (sides) से होकर बाहर निकल जाती है।
- वर्ण: ल (केवल 1 वर्ण)
(vi) प्रकंपित या लुंठित व्यंजन (Trill)
जिस वर्ण के उच्चारण में जीभ की नोक हवा के दबाव से 2-3 बार काँपती (vibrate होती) है या बेलन की तरह लुढ़कती है।
- वर्ण: र (केवल 1 वर्ण)
(vii) उत्क्षिप्त या द्विगुण व्यंजन (Flap)
‘उत्क्षिप्त’ का अर्थ होता है ‘फेंका हुआ’। इनके उच्चारण में जीभ की नोक झटके से ऊपर मूर्धा को छूकर तुरंत नीचे गिरती है, मानो जीभ हवा को बाहर फेंक रही हो।
- वर्ण: ड़, ढ (2 वर्ण)
(viii) अर्धस्वर या ईषत्-स्पृष्ट (Semi-vowels)
इनके उच्चारण में उच्चारण अंग एक-दूसरे को बहुत हल्का स्पर्श करते हैं। ये न तो पूरी तरह व्यंजन हैं और न पूरी तरह स्वर।
- वर्ण: य, व (2 वर्ण)
आभ्यंतर प्रयत्न की त्वरित तालिका (Table)
| भेद का नाम | विशेषता | संबंधित व्यंजन |
| स्पर्षी | वायु का स्पष्ट स्पर्श व रुकावट | क, ख, ग, घ, ट, ठ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, ब, भ |
| स्पर्श-संघर्षी | स्पर्श के साथ हवा का घर्षण | च, छ, ज, झ |
| संघर्षी | सँकरे मार्ग से हवा का घर्षण | श, ष, स, ह |
| नासिक्य | हवा नाक से निकलती है | ङ, ञ, ण, न, म |
| पार्श्विक | हवा जीभ के बगलों से निकलती है | ल |
| प्रकंपित / लुंठित | जीभ में कंपन होता है | र |
| उत्क्षिप्त | जीभ झटके से नीचे गिरती है | ड़, ढ |
| अर्धस्वर | स्वर और व्यंजन के बीच की स्थिति | य, व |
2. बाह्य प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों के भेद
वर्ण के उच्चारण के अंतिम चरण में, जब हवा मुख से बाहर निकलने वाली होती है, तब जो क्रिया होती है उसे बाह्य प्रयत्न कहते हैं।
बाह्य प्रयत्न को मुख्य रूप से दो दृष्टिकोणों से देखा जाता है:
- प्राणत्व (हवा की मात्रा) के आधार पर
- स्वरतंत्री के कंपन (घोषत्व) के आधार पर
[ बाह्य प्रयत्न ]
│
┌─────────────────────────┴─────────────────────────┐
▼ ▼
[ प्राणत्व के आधार पर ] [ घोषत्व के आधार पर ]
(हवा की मात्रा के अनुसार) (कंपन/गूंज के अनुसार)
├── अल्पप्राण ├── अघोष
└── महाप्राण └── सघोष (घोष)
(A) प्राणत्व (हवा की मात्रा) के आधार पर भेद
यहाँ ‘प्राण’ का अर्थ ‘वायु’ या ‘साँस’ से है। उच्चारण के समय फेफड़ों से कितनी हवा बाहर निकल रही है, इसके आधार पर दो भेद होते हैं:
1. अल्पप्राण (Alpaprana)
- परिभाषा: जिन व्यंजनों के उच्चारण में फेफड़ों से कम मात्रा में हवा बाहर निकलती है और ‘ह’ जैसी भारी आवाज उत्पन्न नहीं होती।
- पहचान नियम:
- प्रत्येक वर्ग का 1ला, 3रा और 5वाँ वर्ण (1, 3, 5)
- अंतःस्थ व्यंजन: य, र, ल, व
- द्विगुण व्यंजन का: ड़
- सभी स्वर भी अल्पप्राण होते हैं।
- उदाहरण: क, ग, ङ | च, ज, ञ | ट, ड, ण | त, द, न | प, ब, म
2. महाप्राण (Mahaprana)
- परिभाषा: जिन व्यंजनों के उच्चारण में अधिक मात्रा में हवा बाहर निकलती है और उच्चारण में ‘हकार’ (ह जैसी भारी गूंज) की स्पष्ट ध्वनि सुनाई देती है।
- पहचान नियम:
- प्रत्येक वर्ग का 2रा और 4था वर्ण (2, 4)
- ऊष्म व्यंजन: श, ष, स, ह
- द्विगुण व्यंजन का: ढ
- उदाहरण: ख, घ | छ, झ | ठ, ढ | थ, ध | फ, भ
याद रखने का शॉर्टकट सूत्र:
- अल्पप्राण = 135 + अंतःस्थ (य, र, ल, व)
- महाप्राण = 24 + ऊष्म (श, ष, स, ह)
(B) स्वरतंत्री के कंपन (घोषत्व) के आधार पर भेद
गले में स्थित स्वरतंत्री (Vocal Cords) में हवा के टकराने से कंपन पैदा होता है या नहीं, इसके आधार पर भी दो भेद हैं:
1. अघोष वर्ण (Aghosh)
- परिभाषा: जिन वर्णों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में कोई झनकार या कंपन उत्पन्न नहीं होता, केवल ‘श्वास’ का प्रयोग होता है।
- पहचान नियम:
- प्रत्येक वर्ग का 1ला और 2रा वर्ण (1, 2)
- ऊष्म व्यंजन में से: श, ष, स (ह को छोड़कर)
- कुल संख्या: 13 व्यंजन (क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ + श, ष, स)
2. सघोष या घोष वर्ण (Saghosh)
- परिभाषा: जिन वर्णों के उच्चारण में हवा के घर्षण से स्वरतंत्रियों में कंपन या गूंज पैदा होती है।
- पहचान नियम:
- प्रत्येक वर्ग का 3रा, 4था और 5वाँ वर्ण (3, 4, 5)
- अंतःस्थ व्यंजन: य, र, ल, व
- ऊष्म व्यंजन का: ह
- द्विगुण व्यंजन: ड़, ढ
- सभी 11 स्वर भी सघोष होते हैं।
याद रखने का शॉर्टकट सूत्र:
- अघोष = 12 + श, ष, स
- सघोष = 345 + य, र, ल, व, ह + सभी स्वर
बाह्य प्रयत्न की एकीकृत तुलनात्मक तालिका (Comprehensive Table)
परीक्षा की दृष्टि से व्यंजनों का यह संयुक्त वर्गीकरण चार्ट बेहद उपयोगी है:
| वर्ग / प्रकार | अल्पप्राण – अघोष | महाप्राण – अघोष | अल्पप्राण – सघोष | महाप्राण – सघोष | अल्पप्राण – सघोष |
| वर्ग स्थान | 1ला वर्ण | 2रा वर्ण | 3रा वर्ण | 4था वर्ण | 5वाँ वर्ण |
| क-वर्ग | क | ख | ग | घ | ङ |
| च-वर्ग | च | छ | ज | झ | ञ |
| ट-वर्ग | ट | ठ | ड | ढ | ण |
| त-वर्ग | त | थ | द | ध | न |
| प-वर्ग | प | फ | ब | भ | म |
| अन्य | – | श, ष, स | य, र, ल, व, ड़ | ह, ढ | सभी स्वर |
आत्म-परीक्षण (Self-Test Method)
आप स्वयं प्रयोग करके आभ्यंतर और बाह्य प्रयत्न को समझ सकते हैं:
- अल्पप्राण बनाम महाप्राण: अपनी हथेली को मुँह के ठीक सामने रखें।
- बोलें “क” — हथेली पर हवा का स्पर्श बहुत कम महसूस होगा।
- बोलें “ख” — हथेली पर गरम हवा का तेज झटका महसूस होगा।
- अघोष बनाम सघोष: अपनी दोनों उंगलियों को गले (कंठ) पर हल्के से रखें।
- बोलें “च, छ” — गले में कोई हलचल नहीं होगी।
- बोलें “ज, झ” — गले में उंगलियों के नीचे स्पष्ट झनझनाहट (vibration) महसूस होगी।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अभ्यास प्रश्न (Quiz)
प्रश्न 1: ‘र’ व्यंजन का आभ्यंतर और बाह्य प्रयत्न के आधार पर सही वर्गीकरण क्या है?
उत्तर: आभ्यंतर दृष्टि से यह लुंठित/प्रकंपित है; बाह्य दृष्टि से यह अल्पप्राण और सघोष व्यंजन है।
प्रश्न 2: ‘ह’ वर्ण अघोष है या सघोष?
उत्तर: ‘ह’ वर्ण सघोष और महाप्राण व्यंजन है। यद्यपि यह ‘श, ष, स’ के साथ ऊष्म वर्ग में आता है, फिर भी इसमें गूंज होने के कारण यह सघोष माना जाता है।
प्रश्न 3: किस आभ्यंतर प्रयत्न वाले वर्णों को ‘अर्धस्वर’ कहा जाता है?
उत्तर: य और व को अर्धस्वर कहा जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
हिंदी भाषा में वर्णों का विभाजन किसी यादृच्छिक (random) नियम पर नहीं, बल्कि मानव शरीर की ध्वन्यात्मक क्षमता पर आधारित है। आभ्यंतर प्रयत्न जहाँ मुख के अंदर जीभ और तालु की स्थिति को दर्शाता है, वहीं बाह्य प्रयत्न गले की गूंज और साँस के प्रवाह को नियंत्रित करता है।
यदि आप आभ्यंतर के 8 भेदों (स्पर्शी, नासिक्य, प्रकंपित आदि) और बाह्य प्रयत्न के वर्गीकरण (अल्पप्राण-महाप्राण, सघोष-अघोष) को अच्छी तरह समझ लेते हैं, तो न केवल हिंदी व्याकरण पर आपकी पकड़ मजबूत होगी, बल्कि परीक्षाओं में इससे जुड़े किसी भी प्रश्न का सटीक उत्तर देना आपके लिए चुटकियों का खेल बन जाएगा।
![]()